सरहद के रक्षकों को ‘जहरीली’ सौगात: गोंडा में जवानों की थाली में परोसी गई सड़ांध!
रेलवे की 'कैटरिंग' या जवानों की सेहत से खिलवाड़? बदबूदार खाने पर भड़के BSF-CRPF जवान।
सियासत के ‘सूरमाओं’ को शाही दावत, सरहद के ‘रखवालों’ को सड़ा खाना?
गोंडा से विशेष रिपोर्ट: अजीत मिश्रा (खोजी)
गोंडा। देश की सुरक्षा का भार अपने कंधों पर उठाने वाले जवानों के साथ सिस्टम की संवेदनहीनता का एक शर्मनाक मामला गोंडा रेलवे स्टेशन पर सामने आया है। अमृतसर से न्यू जलपाईगुड़ी जा रही मिलिट्री इलेक्शन स्पेशल ट्रेन में सवार करीब 1000 BSF और CRPF के जवानों को वह खाना परोसा गया, जिसे इंसान तो क्या, जानवर भी न छुएं। चुनावी ड्यूटी के लिए निकले इन योद्धाओं की थाली में ‘भोजन’ नहीं, बल्कि ‘बीमारी’ परोसी गई थी।
बिरयानी से आती बदबू और सिस्टम की सड़ांध
रविवार दोपहर जब ट्रेन गोंडा स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 3 पर रुकी, तो जवानों को लंच में बिरयानी के पैकेट दिए गए। पैकेट खुलते ही जो मंजर सामने आया, उसने रेलवे के खान-पान दावों की पोल खोल दी। पैकेटों से उठती तीखी सड़ांध ने जवानों को आक्रोशित कर दिया। भूखे पेट सफर कर रहे इन जवानों ने विरोध स्वरूप उन पैकेटों को प्लेटफॉर्म पर ही सजा दिया। यह नजारा रेलवे प्रशासन और फूड प्लाजा संचालकों के लिए शर्म का विषय होना चाहिए था, लेकिन वहां भी ‘प्रक्रिया’ का रोना रोया गया।
“अगर जवानों ने यह खाना खा लिया होता, तो उनकी सेहत पर गंभीर संकट आ सकता था। बदबू आने के कारण हमने तुरंत खाना वापस कर दिया।”
— आर. प्रसाद, कमांडेंट (BSF)
सिर्फ जांच का आश्वासन, समाधान कब?
हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद क्षेत्रीय प्रबंधक जितेंद्र कुमार का कहना है कि उन्हें ‘लिखित शिकायत’ का इंतजार है। क्या 1000 जवानों का खाली पेट और प्लेटफॉर्म पर बिखरा सड़ा हुआ खाना एक अधिकारी की आंखें खोलने के लिए काफी नहीं है? क्या हर बार देश के रक्षकों को अपना हक मांगने के लिए शिकायत दर्ज करानी होगी?
खड़े होते कड़वे सवाल:
मुनाफे की भूख: क्या चंद रुपयों के कमीशन के चक्कर में फूड प्लाजा संचालक जवानों की जान जोखिम में डाल रहे हैं?
निगरानी का अभाव: मिलिट्री स्पेशल जैसी महत्वपूर्ण ट्रेनों के लिए खाने की गुणवत्ता की जांच पहले क्यों नहीं की गई?
जिम्मेदारी किसकी: अगर फूड प्वाइजनिंग जैसी घटना हो जाती, तो क्या रेलवे इसकी जिम्मेदारी लेता या इसे ‘तकनीकी खामी’ बताकर पल्ला झाड़ लेता?
निष्कर्ष:
चुनाव की गहमागहमी के बीच इन जवानों को एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे पर भेजा जा रहा है। वे अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर लोकतंत्र के पर्व को सुरक्षित बनाने निकले हैं। उन्हें सम्मान न सही, कम से कम ‘इंसानी खाना’ तो मिलना ही चाहिए। गोंडा की यह घटना एक चेतावनी है—अगर जवानों की थाली में सड़ांध है, तो समझ लीजिए कि व्यवस्था की जड़ों में उससे भी बड़ी सड़ांध लग चुकी है।













